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गुरुवार, 18 जुलाई 2013

"बचपन को लौटा दो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सीधा-सादा. भोला-भाला।
बच्चों का संसार निराला।।

बचपन सबसे होता अच्छा।
बच्चों का मन होता सच्चा।

पल में रूठें, पल में मानें।
बैर-भाव को ये क्या जानें।।

प्यारे-प्यारे सहज-सलोने।
बच्चे तो हैं स्वयं खिलौने।।

बच्चों से नारी है माता।
ममता से है माँ का नाता।।

बच्चों से है दुनियादारी।
बच्चों की महिमा है न्यारी।।

कोई बचपन को लौटा दो।
फिर से बालक मुझे बना दो।।

16 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर बाल रचना-
    आभार गुरु जी-

    उत्तर देंहटाएं
  2. प्यारे-प्यारे बहुत सलोने।
    बच्चे तो हैं स्वयं खिलौने।।

    उत्तर देंहटाएं
  3. एक बार जाने के बाद बचपन वापस नही आता सिर्फ़ उसकी याद ही आती है.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुंदर बाल रचना,,आभार..

    उत्तर देंहटाएं
  5. हर किसी का दिल यही कहता है.....
    बचपन जैसी कोई उम्र नहीं.. ये बात बड़े होकर समझ में आती है!

    ~सादर!!

    उत्तर देंहटाएं
  6. प्यारी-सी यह भोली कविता,जैसे कोई निर्मल सरिता!

    उत्तर देंहटाएं
  7. बढिया, बहुत सुंदर

    मेरी कोशिश होती है कि टीवी की दुनिया की असल तस्वीर आपके सामने रहे। मेरे ब्लाग TV स्टेशन पर जरूर पढिए।
    MEDIA : अब तो हद हो गई !
    http://tvstationlive.blogspot.in/2013/07/media.html#comment-form

    उत्तर देंहटाएं

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