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रविवार, 14 जुलाई 2013

"रूप पुराना लगता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

वक्त सही हो तो सारा, संसार सुहाना लगता है।
बुरे वक्त में अपना साया भी, बेगाना लगता है।।

यदि अपने घर व्यंजन हैं, तो बाहर घी की थाली है,
भिक्षा भी मिलनी मुश्किल, यदि अपनी झोली खाली है,
गूढ़ वचन भी निर्धन का, जग को बचकाना लगता है।
बुरे वक्त में अपना साया भी, बेगाना लगता है।।

फूटी किस्मत हो तो, गम की भीड़ नजर आती है,
कालीनों को बोरों की, कब पीड़ नजर आती है,
कलियों को खिलते फूलों का रूप पुराना लगता है।
बुरे वक्त में अपना साया भी, बेगाना लगता है।।

धूप-छाँव जैसा, अच्छा और बुरा हाल आता है,
बारह मास गुजर जाने पर, नया साल आता है,
खुशियाँ पा जाने पर ही अच्छा मुस्काना लगता है।
बुरे वक्त में अपना साया भी, बेगाना लगता है।।

13 टिप्‍पणियां:

  1. जीवन की सच्चाइयां बयान करती रचना....बहुत सही कहा है आपने...
    महोदय.........साभार....

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह !!!!!!!!!
    जीवन का यथार्थ गीत में उतर आया है.
    गूढ़ वचन भी निर्धन का, जग को बचकाना लगता है---इस पंक्ति के लिये खासतौर पर दाद स्वीकार कीजिये......

    उत्तर देंहटाएं
  3. footi kishmat ho apani,gam ki bheed najar tab aati hai. sundar kaalino ko boro ki,yanha peed najar kab aati hai. bahut sundar.

    उत्तर देंहटाएं
  4. वक्त सही हो तो सारा, संसार सुहाना लगता है।
    अपने तो अपने बेगाना भी अपना लगता है .....
    सटीक रचना शास्त्री जी ....

    उत्तर देंहटाएं
  5. वक्त सही हो तो सारा, संसार सुहाना लगता है।
    बुरे वक्त में अपना साया भी, बेगाना लगता है।।

    बहुत खूब,सुंदर और सटीक प्रस्तुति,,,

    RECENT POST : अपनी पहचान

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर है कहावतों को चंद में पिरोना .वाह !

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत खूब,सुंदर और सटीक प्रस्तुति,,,

    उत्तर देंहटाएं

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