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मंगलवार, 16 जुलाई 2013

"चला है दौर ये कैसा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सियासत में विरासत का, चला है दौर ये कैसा
इबारत में बनावट का, चला है दौर ये कैसा

जहाँ लाचार हो जनता, जहाँ मजदूर हों घायल,
खनक कैसे सुनायेगी, दुल्हन के पाँव की पायल,
नफासत में हिदायत का, चला है दौर ये कैसा

लिखाकर अपनी मर्जी का, दबाया पात्र भूतल में,
मगर अब लौह की नौका, लगी है डूबने जल में,
लिखावट में मिलावट का, चला है दौर ये कैसा

ख़ज़ाना कर दिया खाली, भरी अपनी तिजोरी है,
हमारे तो वतन में अब, पनपती घूसखोरी है,
अमानत में खयानत का, चला है दौर ये कैसा

भिखारी हो गये राजा, हमारे वोट को पाकर,
बुलाये वणिक परदेशी, कमीशन की रकम खाकर,
सराफत में हिमाकत का, चला है दौर ये कैसा

12 टिप्‍पणियां:

  1. मुश्‍कि‍ल समय से गुजर रहे हैं हम

    उत्तर देंहटाएं
  2. ख़ज़ाना कर दिया खाली, भरी अपनी तिजोरी है,
    हमारे तो वतन में अब, पनपती घूसखोरी है,
    अमानत में खयानत का, चला है दौर ये कैसा !

    बहुत सटीक कहा शास्त्री जी
    यह सब देशवासियों की ही बेवकूफी की वजह से !

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत उम्दा,सुंदर सटीक सृजन,,,वाह!!!वाह क्या बात है,,,

    RECENT POST : अभी भी आशा है,

    उत्तर देंहटाएं
  4. ये दौर तो कब से ऐसा ही चला आ रहा है ...बदलाव हुआ कहाँ अभी

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुंदर सटीक प्रस्तुति !...आभार

    उत्तर देंहटाएं
  6. लूट, मिली है छूट,
    चलो हम बैंक भरेंगे,
    बाट लगायें कूट,
    कहाँ से हम सुधरेंगे।

    उत्तर देंहटाएं

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