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बुधवार, 17 जुलाई 2013

"ग़ज़ल-काँटे बुहार लेना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

फूलों को रहने देना, काँटे बुहार लेना।
जीवन के रास्तों को, ढंग से निखार लेना।

सावन की घन-घटाएँ, बरसे बिना न रहतीं,
बारिश की मार से तुम, मन को न हार देना।

इठला रहे हैं अब तो, सूखी नदी-गधेरे,
गर हो सके तो इनसे, मस्ती उधार लेना।

धरती में लहलहाते, बिरुए तुम्हें बुलाते,
करके निराई इनका, आँचल सँवार देना।

मस्ती में झूमते हैं, गुंजार कर रहे हैं,
तुम सादगी से अपने, लम्हें गुज़ार देना।

चढ़ती हुई नदी का, तो रूप मस्त होता,
तुम ज़लज़ले से अपना, यौवन उबार लेना।

18 टिप्‍पणियां:

  1. मस्ती में झूमते हैं, गुंजार कर रहे हैं,
    तुम सादगी से अपने, लम्हें गुज़ार देना।

    Bahut sundar !

    उत्तर देंहटाएं
  2. फूलों को रहने देना, काँटे बुहार लेना।
    जीवन के रास्तों को,ढंग से निखार लेना।

    बहुत उम्दा!!! क्या बात है

    RECENT POST : अभी भी आशा है,

    उत्तर देंहटाएं
  3. उज्जवल जीवन के हसीं नुस्खे ...
    आभार!

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत ही बेहतरीन रचना,,,,
    :-)

    उत्तर देंहटाएं
  5. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 18/07/2013 के चर्चा मंच पर है
    कृपया पधारें
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  6. वाह....
    धरती में लहलहाते, बिरुए तुम्हें बुलाते,
    करके निराई इनका, आँचल सँवार देना।
    सुन्दर...
    बहुत सुन्दर भाव...

    सादर
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  7. फूलों को रहने देना, काँटे बुहार लेना।
    जीवन के रास्तों को, ढंग से निखार लेना।

    क्या बात है.....

    उत्तर देंहटाएं
  8. जीवन के रस्ते को ढंग से निखार लेना!
    बढ़िया !

    उत्तर देंहटाएं
  9. सुन्दर भाव,बहुत ही बेहतरीन रचना,सादर

    उत्तर देंहटाएं
  10. आप की सभी रचनाएं मन को छूने वाली होती है...
    सुंदर भाव...

    एक नजर इधर भी...
    यही तोसंसार है...



    उत्तर देंहटाएं
  11. बहुत सुन्दर प्रस्तुति..अभिव्यंजना में..मेरी नई पोस्ट."कदम धरती पर ,मन में आसमान हो"

    उत्तर देंहटाएं
  12. आप की सभी रचनाएं मन को छूने वाली होती है,बेहतरीन रचना आभार आदरणीय।

    उत्तर देंहटाएं

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