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शनिवार, 13 जुलाई 2013

"नहीं आता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मुझे तो छन्द और मुक्तक, बनाना भी नहीं आता।
ग़ज़ल में शैर और मक़्ता, लगाना भी नहीं आता।।

दिलों के बलबलों को मैं, भला अल्फ़ाज़ कैसे दूँ,  
मुझे लफ्ज़ों का गुलदस्ता, सजाना भी नहीं आता।

सुहाने साज मुझको, प्यार से आवाज़ देते हैं,
मगर मजबूर हूँ, इनको बजाना भी नहीं आता।

भरा है प्यार का सागर, मैं कैसे जाम में ढालूँ,
भरी गागर का पानी, मुझको छलकाना नहीं आता।

महकता है-चहकता है, ये ग़ुलशन खिलखिलाता है,
मुझे क्यारी में खारे जल को, टपकाना नहीं आता।

भयानक रूप पर, कोई फिदा कैसे भला होगा,
मुखौटा माँज-धोकर, मुझको चमकाना नहीं आता।

15 टिप्‍पणियां:

  1. एक बहुत ही प्रभावशाली एवँ उत्कृष्ट रचना ! अति सुंदर !

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत ही प्रबावी रचना, कुछ नहीं ज्ञात पर दिशा तो ज्ञात है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. मुझे तो छन्द और मुक्तक, बनाना भी नहीं आता।
    ग़ज़ल में शैर और मक़्ता, लगाना भी नहीं आता।।

    अपनी रचनाओं से आप कितनों के दिल को छूते हैं! इतनी सुंदर पंक्तियाँ लिखने के बावजूद आप लिखते हैं:
    दिलों के बलबलों को मैं, भला अल्फ़ाज़ कैसे दूँ,
    मुझे लफ्ज़ों का गुलदस्ता, सजाना भी नहीं आता।

    बहुत खूब लिखा है आपने, साधुवाद और बधाई!
    सृजन मंच पर दोहों पर चर्चा कर आपने बड़ा पुनीत कार्य किया है, उसके लिए फिर से एक बार आपको साधुवाद और बधाई! आपसे गुजारिश है कि कभी मुक्तकों पर भी यूँ ही चर्चा हो!
    सादर/साभार,
    डॉ. सारिका मुकेश

    उत्तर देंहटाएं
  4. अर्थपूर्ण सुन्दर रचना!...आभार

    उत्तर देंहटाएं
  5. मन के उदगार कैसे भी व्यक्त होने चाहिये
    गज़ल बहर के खेल से परे होने चाहिये

    उत्तर देंहटाएं
  6. भयानक “रूप” पर, कोई फिदा कैसे भला होगा,
    मुखौटा माँज-धोकर,मुझको चमकाना नहीं आता।

    वाह !!! बहुत खूब,सुंदर गजल,,,

    RECENT POST : अपनी पहचान

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत बढ़िया प्रस्तुति बधाई आपको आदरणीय

    उत्तर देंहटाएं
  8. आप को क्या क्या आता है आप नही इससे वाकिफ,
    लाजवाब लिखते हैं आप, पर मुझे कहना नही आता ।

    उत्तर देंहटाएं
  9. apki kalam ney bata diya ki apko kya kya aata hai.....sunder abhivyakti

    उत्तर देंहटाएं

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