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शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

‘‘विश्व में मैं ज्ञान का दीपक जलाऊँ’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



!! वन्दना !!

रात-दिन मैं प्राण की वीणा बजाऊँ।

माँ तुम्हारी वन्दना के स्वर सजाऊँ।।


मैं सुमन बिन गन्ध का हूँ वाटिका में,

किस तरह यह पुष्प मन्दिर में चढ़ाऊँ।

माँ तुम्हारी वन्दना के स्वर सजाऊँ।।


मैं निबल हूँ आपका ही है सहारा,

थाम लो माँ हाथ मैं अपना बढ़ाऊँ।

माँ तुम्हारी वन्दना के स्वर सजाऊँ।।


दो मुझे वरदान तुम हे शारदे माँ!

आरती को अर्चना में गुन-गुनाऊँ।

माँ तुम्हारी वन्दना के स्वर सजाऊँ।।


साधना में मातु तुम विज्ञान भर दो,

विश्व में मैं ज्ञान का दीपक जलाऊँ।

माँ तुम्हारी वन्दना के स्वर सजाऊँ।।

16 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रेरक ज्ञान दीप जलाए मिलकर . बहुत उम्दा रचना .

    उत्तर देंहटाएं
  2. माँ शारदा की वंदना और वो भी इतने सुंदर ढंग से..वंदना अच्छी लगी..लयबद्ध रचना..मन बार बार गाने का हो रहा है.
    बधाई!!!

    उत्तर देंहटाएं
  3. साधना में मातु तुम विज्ञान भर दो,

    विश्व में मैं ज्ञान का दीपक जलाऊँ।

    माँ तुम्हारी वन्दना के स्वर सजाऊँ।।



    bahut hi achchi aur prernadaayi vandana.....

    dhnaywaad....

    उत्तर देंहटाएं
  4. मैं भी
    माँ तुम्हारी वन्दना के स्वर सजाऊँ!

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत हीं सुन्दर समर्पित रचना । शुभकामनायें ।

    उत्तर देंहटाएं
  6. भाई रावेंद्रकुमार रवि जी!
    100वें अनुसरणकर्ता के रूप में उच्चारण के मित्र बनने के लिए आपका आभार!
    एतदर्थ धन्यवाद ज्ञापित कर करता हूँ

    उत्तर देंहटाएं
  7. विश्व में मैं ज्ञान का दीपक जलाऊँ।

    माँ तुम्हारी वन्दना के स्वर सजाऊँ।।

    शास्त्री जी जवाब नहीं आप की लेखनी का . अत्यंद सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  8. प्रेरणादायी, मन को छूनेवाली सरस्‍वती वंदना के लिए बधाई। बहुत दिनों बाद इतनी सुन्‍दर सरस्‍वती वंदना पढने को मिली।

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत ही शुभ इच्छा है। बधाई।
    दुर्गापूजा एवं दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएँ।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत सुन्दर रचना है मा शारदे का आप पर पूरा प्यार है जो आपकी कलम से झाँक रहा है बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  11. वन्दना पढ कर बहुत सुंदर लगा, सुबह सुबह मां की आरती हो गई.
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  12. ek behtreen vandana hai maa ki.
    मैं सुमन बिन गन्ध का हूँ वाटिका में, किस तरह यह पुष्प मन्दिर में चढ़ाऊँ। माँ तुम्हारी वन्दना के स्वर सजाऊँ।।

    waah ..........adbhut kintu satya.
    is vandana ki jitni tarif ki jaye kam hai.maa aapko aise hi prerit karti rahein likhne ke liye.

    उत्तर देंहटाएं

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