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बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

"ग़ज़ल-दिल्लगी समझते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

दिल में जब भी च़राग जलते हैं।
संग-ए-दिल आँच में पिघलते हैं

बेक़रारी के खाद-पानी से,
कुछ तराने नये मचलते हैं।

पत्थरों के जिगर को छलनी कर,
नीर-निर्झर नदी में ढलते हैं।।

आह पर वाह-वाह! करते हैं,
जब भी हम करवटें बदलते हैं।

वो समझते हैं पीड़ को मस्ती,
नग़मग़ी राग जब निकलते हैं।

मनचलों की यही रवायत है
दिल लगी, दिल्लगी समझते हैं,

अपनी गर्दन झुका नहीं पाते,
रूपको देख हाथ मलते हैं।

8 टिप्‍पणियां:

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