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सोमवार, 9 फ़रवरी 2015

"दोहेःचॉकलेट-डे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

भोली चिड़ियों के लिए, लाये नये रिवाज़।
चॉकलेट को चोंच में, लेकर आये बाज़।।
--
रंग पश्चिमी ढंग का, अपना रहा समाज।
देते मीठी गोलियाँ, मित्रों को सब आज।।
--
मन में भेद भरा हुआ, मुख में भरा मिठास।
कृत्रिम सुमनों में भला, होगी कहाँ सुवास।।
--
जहाँ चुभन देने लगे, पालक बनकर शूल।
बोलो कैसे सुमन का, मन होगा अनुकूल।।
 --
मतलब के ही वास्ते, होती है मनुहार।
चॉकलेट देकर नहीं, उगता दिल में प्यार।।

9 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (10-02-2015) को 'चाकलेट-डे' चोंच में, लेकर आया बाज ; चर्चा मंच 1885 पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!

    उत्तर देंहटाएं
  3. मतलब के ही वास्ते, होती है मनुहार।
    चॉकलेट देकर नहीं, उगता दिल में प्यार।।

    बहुत सुन्दर प्रस्तुति…

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत ही बढियां..
    एकदम सार्थक रचना सर जी...

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत ही सुन्दर सार्थक प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं

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