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सोमवार, 16 फ़रवरी 2015

"गीत-भोले-शंकर आओ-आओ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

भोले-शंकर आओ-आओ।
निद्रा-तन्द्रा दूर भगाओ।।

आज आदमी है बेचारा,
बौराया है ये जग सारा,
दूषित है परिवेश हमारा,
हे शिव! आकर आज वतन में,
डमरू का तुम नाद सुनाओ।
निद्रा-तन्द्रा दूर भगाओ।।

छाया है घनघोर अँधेरा,
नकली भगवानों ने घेरा,
गड़े हुए हैं तम्बू-डेरा,
सच्चाई को करो उजागर,
ढोंग और पाखण्ड हटाओ।
निद्रा-तन्द्रा दूर भगाओ।।

जीवन आशामुखी नहीं है,
अपने दुख से दुखी नहीं है,
इसीलिए जग सुखी नहीं है,
सम्बन्धों में नहीं मधुरता,
शंकर! मन का मैल मिटाओ।
निद्रा-तन्द्रा दूर भगाओ।।

लुप्त हो गयी है खुद्दारी,
जन-गण-मन में है मक्कारी,
गद्दी पर बैठी गद्दारी,
देशभक्ति को जीवित कर दो,
खुदगर्ज़ी पर रोक लगाओ।
निद्रा-तन्द्रा दूर भगाओ।।

आज आपका अभिनन्दन है,
बेलपत्र-अक्षत-चन्दन है,
महादेव का ही वन्दन है,
अब सोया परिवेश जगाओ।
निद्रा-तन्द्रा दूर भगाओ।।
 (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुंदर और अध्‍यात्मिक कविता।

    उत्तर देंहटाएं
  2. उत्तम...बहुत सुन्दर।
    भगवन शिव सब मंगल करें।

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुंदर, शिवमय...महाशिवरात्रि की शुभकामनाएँ !!

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज मंगलवार को '
    भोले-शंकर आओ-आओ"; चर्चा मंच 1892
    पर भी है ।

    उत्तर देंहटाएं

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