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मंगलवार, 1 सितंबर 2015

गीत ‘‘प्यार को मापने का नही यन्त्र है’ ’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

बावफा के लिए तो नियम हैं बहुत,
बेवफाई का कोई नही तन्त्र है।
सर्प के दंश की तो दवा हैं बहुत ,
आदमी के डसे का नही मन्त्र है।।

गन्ध देना ही है पुष्प का व्याकरण,
दुग्ध देना ही है गाय का आचरण,
तोल और माप के तो हैं मीटर बहुत,
प्यार को मापने का नही यन्त्र है।
आदमी के डसे का नही मन्त्र है।।

ईद, होली, दिवाली के त्योहार में,
दम्भ की है मिलावट भरी प्यार में,
आ बसी हैं विदेशों की पागल पवन,
छल-कपट से भरा आज जनतन्त्र है।
आदमी के डसे का नही मन्त्र है।।

नींव कमजोर पर हैं इमारत खड़ी,
शून्य से हो रहीं हैं इबारत बड़ी,
राम के राज में चोर-डाकू बहुत,
झूठ आजाद है, सत्य परतन्त्र है।
आदमी के डसे का नही मन्त्र है।।

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