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सोमवार, 14 सितंबर 2015

"हिन्दीदिवस पर दो रचनाएँ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

हिन्दीदिवस पर सभी देशवासियों को
हार्दिक शुभकामनाएँ!

दो रचनाएँ
(१)
हिन्दीभाषा को अपनायें।
आओ हिन्दीदिवस मनायें।।

हिन्दीवालों की हिन्दी ही
क्यों इतनी कमजोर हो गयी?
भाषा डूबी अँधियारे में,
अंग्रेजी की भोर हो गई।
एक वर्ष में चौदह दिन ही
हिन्दी की गाथा को गायें।
आओ हिन्दीदिवस मनायें।१।

चीरहरण करते भाषा का,
ये काले अंग्रेज निरन्तर।
भेद-भाव की करतूतों से,
छेद रहे माता का अन्तर।
संविधान को धता बताकर,
ये मनमाने ढोल बजायें।
आओ हिन्दीदिवस मनायें।२।

जो जन-जन का राजदुलारा,
उसको है इण्डिया बनाया।
अपने को इण्डियन बताकर,
भारतीयता को बिसराया।
खाकर के स्वदेश का राशन,
गान विदेशों का ये गायें।
आओ हिन्दीदिवस मनायें।३।

मत माँगे हिन्दी भाषा में,
लोगों को विश्वास दिलाया।
लेकिन संसद में जाकर के,
गिटर-पिटर का सुर अपनाया।
आगामी निर्वाचन में हम,
नेताओं को धरा दिखायें।
आओ हिन्दीदिवस मनायें।४।
--
(२)
कदम-कदम पर साथ निभाती।
कार हमारी हमको भाती।।

हिन्दीदिन पर इसको लाये।
हम सब मन में थे हर्षाये।।

आज पाँचवा जन्मदिवस है।
लेकिन अब भी जस की तस है।।
 
यह सफर की सखी-सहेली।
अब भी है ये नयी-नवेली।।

साफ-सफाई इसकी करते।
इसका ध्यान हमेशा धरते।।

सड़कों पर चलती मतवाली।
कभी न धोखा देने वाली।।

सदा सँवारो सबका जीवन।
चाहे जड़ हो या हो चेतन।।

पूरे घर को तुम हो भायी।
जन्मदिवस पर तुम्हें बधायी।

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