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गुरुवार, 10 सितंबर 2015

दोहे "भारत की हो विश्व में हिन्दी से पहचान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


चारों तरफ मची हुई, हिन्दी की है धूम।
सारे झूठी शान में, रहे खुशी से झूम।।
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जैसे ही होगा खतम, सिप्टम्बर का माह।
उतर जायेगा तब सभी, लोगों का उत्साह।।
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सुधर जाय यदि वर्तनी, हिन्दी बने समर्थ।
हिन्दी-हिन्दी गायकर, गाल बजाना व्यर्थ।।
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हिन्दी का अब व्याकरण, नहीं बाँचते लोग।
बात-बात में कर रहे, हिंग्लिश का उपयोग।।
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जितनी भी आयी-गयी, दिल्ली में सरकार।
नहीं किसी ने भी किया, हिन्दी का उपकार।।
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सदियों से चिल्ला रहे, हिन्दी-दिन्दुस्तान।
अब तो वो खुद बन गये, दिल्ली के सुल्तान।।
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देखेंगे इस माह भी, उनका हिन्दी प्यार।
हिन्दी उनसे माँगती, अब अपना अधिकार।।
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आशाएँ तो बहुत हैं, मन में हैं अरमान।
भारत की हो विश्व में, हिन्दी से पहचान।।
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