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बुधवार, 23 सितंबर 2015

दोहे "राजनीति का ताल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



सात दशक में भी यहाँ, आया नहीं विकास।
दुनिया भर में हो रहा, भारत का उपहास।।
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जनसेवक हों जहाँ पर, घोटालों में लिप्त।
आपाधापी में हुआ, लोकतन्त्र संक्षिप्त।।
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प्रजातन्त्र का है नहीं, कोई भी संचार।
पुत्र-पुत्रियों की हुई, दल-दल में भरमार।।
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कहीं मात अरु तात हैं, बने हुए सरदार।
उनके वंशज समझते, खुद को नम्बरदार।।
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राजनीति की बेल में, फूल रहा परिवार।
खानदान के हाथ में, निर्णय का अधिकार।।
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जाति-धर्म के दे रहे, भड़काऊ सन्देश।
रहे सलामत कुर्सियाँ, जाय भाड़ में देश।
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आज हुआ धनवान वो, जो कल था कंगाल।
देता है सुख-सम्पदा, राजनीति का ताल।।

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