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सोमवार, 14 सितंबर 2015

"चौदह सितम्बर को समर्पित चौदह दोहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


हिन्दी का दिन बन गया, अब तो एक मखौल।
अंग्रेजी के भक्त भी, बजा रहे हैं ढोल।१।

हिन्दी-डे कहने लगे, अब तो नौकरशाह।
लेकिन मन में है नहीं, हिन्दी की कुछ चाह।२।

आन-बान-अभिमान का, मेट रहे अस्तित्व।
राजनीति की तान का, बिगड़ा हुआ घनत्व।३।

सूरज जब खाने लगे, खुद ही अपनी धूप।
तब अँधियारा चीर कर, कैसे निखरे रूप।४।

शब्दों में जिसके रमा, उपमा का उपमान।
उस हिन्दी का हो रहा, पग-पग पर अपमान।५।

कभी न थमने पायेगी, सन्तों की आवाज।
मानस को श्रीराम की, पढ़ता रोज समाज।६।

युगों-युगों से चल रहे, खण्ड-काल और कल्प।
देवनागरी का नहीं, दूजा कोई विकल्प।७।

अपनी हिन्दी में निहित, जीवन का सब सार।
सन्तों के उपदेश पर, कर लो तनिक विचार।८।

काव्यशास्त्र में खूब है, छन्दों की भरमार।
सरस-सरल है तरल भी, अलंकार बौछार।९।

गद्य-पद्य से युक्त है, हिन्दी का साहित्य।
हिन्दी के परिवेश में, भरा हुआ लालित्य।१०।

उद्गम जिसमें प्रीत का, जीवन का है सार।
सारे जग को बाँटिए, हिन्दी का उपहार।११।

तुलसी-सूर-कबीर से, हुए न अब तक भक्त।
हिन्दी के उत्थान में, सदा रहे अनुरक्त।१२।

जिसके पुण्य-प्रताप से, देश हुआ स्वाधीन।
फिर किस कारण से हुई, अपनी भाषा क्षीण।१३।

अपने प्यारे देश में, समझो तभी सुराज।
अपनी भाषा में करे, जब हम अपने काज।१४।

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