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सोमवार, 7 सितंबर 2015

दोहे "करें सितम्बर मास में, हिन्दी का कल्याण" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

देवनागरी की हुई, दशा बहुत दयनीय।
आज परायी सी लगे, निजभाषा कमनीय।।
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हिन्दी तो सुधरी नहीं, अंग्रेजी भी गोल।
मिला-जुला कर बोलते, सब हिंग्लिश में बोल।।
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नंगेपन की दौड़ में, लुप्त हो रही लाज।
कविता की कमनीयता, सुप्त हो रही आज।।
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समझ न पाये जो कभी, छन्दों का विज्ञान।
काव्य बताकर गद्य को, परस रहे अज्ञान।।
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कैसे हो समृद्ध अब, हिन्दी का साहित्य।
कुटिलनीति में खो गया, शब्दों का लालित्य।।
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पायी क्या स्वाधीनता, हुई सभ्यता नष्ट।
अधिकारी अधिकांश हैं, आज देश में भ्रष्ट।।
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मिली नहीं अब तक यहाँ, भाषा को पहचान।
सात दशक से हो रहा, हिन्दी का अपमान।।
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नहीं हमारे देश की, भाषा अब तक कोय।
मत के दल-दल में रहे, मतवालों को धोय।।
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जिन-जिन पर आशा धरी, किया उन्होंने घात।
भाषा के तो नाम पर, करते सब आघात।।
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मत पाने के लिए है, हिन्दी का उपयोग।
हिन्दी-डे कहने लगे, संसद में अब लोग।।
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चौदह दिन के लिए ही, करते जय-जयकार।
बाकी पूरे सालभर, हिन्दी को दुत्कार।।
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करें सितम्बर मास में, हिन्दी का कल्याण।
भव्य इमारत का करें, सपनों में निर्माण।।

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