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बुधवार, 9 सितंबर 2015

दोहे "वृद्धावस्था में कभी, मत होना मग़रूर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


आज आइने में सुबह, देखा अपना रूप।
क्रूर समय के गाल में, समा गयी सब धूप।।
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अपनी सूरत देख कर, विदित हुआ परिणाम।
उगते सूरज को करें, झुककर सभी प्रणाम।।
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नहीं अनोखी रीत यह, जग का यही विधान।
तब तक जग सुन्दर लगे, जब तक तन में जान।।
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सुख से जीना है अगर, प्रकट न कीजे भाव।
बिन माँगे मत दीजिए, अपने कभी सुझाव।।
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हठ करने का समय अब, निकल गया है दूर।
वृद्धावस्था में कभी, मत होना मग़रूर।।
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टोका-टाकी है बुरी, नयी पौध के साथ।
रखना शुभ आशीष का, सबके सिर पर हाथ।।
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दुनिया में चाहो अगर, पाना कुछ सम्मान।
अपनों पर मत तानना, वाणी का संधान।।
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नहीं खोलना कभी भी, कहीं किसी की पोल।
जीवन के जंजाल में, रिश्ते हैं अनमोल।।
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नाज़ुक होते हैं बहुत, दुनिया में सम्बन्ध।
सम्बन्धों में कभी भी,  करना मत अनुबन्ध।।

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