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रविवार, 6 सितंबर 2015

ग़ज़लनुमा नज़्म "चमन का सिंगार करना चाहिए" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


सोच में विस्तार करना चाहिए
ज़िन्दग़ी को प्यार करना चाहिए

हौसले से थाम कर पतवार को
सागरों को पार करना चाहिए

मुल्क की अस्मत बचाने के लिए
दुश्मनों पर वार करना चाहिए

अमन का सन्देश देने के लिए
क़ौम को तैयार करना चाहिए

मतलबी सौदागरों के साथ में
सोच कर इक़रार करना चाहिए

जब मुकम्मल हो भरोसा इश्क पर
प्यार का इज़हार करना चाहिए

सिखाती है सभ्यता अपनी यही
मेहमान का सत्कार करना चाहिए

चाहते अपने लिए जो आप हों
बस वही ब्यौहार करना चाहिए

बिन महक के “रूप” तो बेकार है
चमन का सिंगार करना चाहिए

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