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रविवार, 15 मई 2016

"बातें ही बातें" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


रसना से मिलती सौगातें
अच्छी लगतीं प्यारी बातें

दो से चार नयन जब होते
आँखों में हो जाती बातें

दोपाये और चौपाये भी
करते न्यारी-न्यारी बातें

हाव-भाव और भाव-भंगिमा
करते कितनी सारी बातें

पलकों पर जब बिन्दु छलकते
हो जातीं दुखियारी बातें

जब अधरों पर हँसी चहकती
तब होती सुखकारी बातें

जब बातों से बात निकलतीं
टीका-टिप्पणीकारी बातें

काली-अंधियारी रातों में
होती विस्मयकारी बातें

त्यौहारों की मधु-बेला में
आशा की संचारी बातें

बाग-बगीचे, वन-उपवन में
आती हैं संसारी बातें

अपनी बातें-उनकी बातें
जीवन पर आधारी बातें

बातें करना है लाचारी
कितनी हैं बेचारी बातें 

"रूप" सलोना सबको भाता
होती हैं कजरारी बातें

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