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गुरुवार, 19 मई 2016

ग़ज़ल "जीवन को हँसी-खेल समझना न परिन्दों" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


अनज़ान रास्तों पे निकलना न परिन्दों 
जीवन को हँसी-खेल समझना न परिन्दों 

आगे कदम बढ़ाना ज़रा देख-भाल कर 
काँटों से तुम कभी भी उलझना न परिन्दों 

भोले कबूतरों के लिए ज़ाल हैं बिछे 
लालच की उस जमीं पे उतरना न परिन्दों 

आजकल के आदमी, शैतान हो गये 
भरकर चटक-लिबास, सँवरना न परिन्दों  

अब मीत-मीत का ही गला काट रहे हैं 
यूँ ही सभी के साथ, विचरना न परिन्दों 

चिड़ियों के “रूप” में छिपे हैं बाज अनेकों 
फूलों को देख करके मचलना न परिन्दों 

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