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सोमवार, 30 मई 2016

ग़ज़ल "बिगड़ा हुआ है आदमी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')




फालतू की ऐँठ मेंअकड़ा हुआ है आदमी।
मज़हबों की कैद मेंजकड़ा हुआ है आदमी।।

सभ्यता की आँधियाँजाने कहाँ ले जायेंगी,
काम के उद्वेग नेपकड़ा हुआ है आदमी।

छिप गयी है अब हकीकतकलयुगी परिवेश में,
रोटियों के देश में, टुकड़ा हुआ है आदमी।

हम चले जब खोजने, उसको गली-मैदान में
ज़िन्दग़ी के खेत मेंउजड़ा हुआ है आदमी।

बिक रही है कौड़ियों में, देख लो इंसानियत,
आदमी की पैठ में, बिगड़ा हुआ है आदमी।

रूप तो है इक छलावा, रंग पर मत जाइए,
नगमगी परिवेश में, पिछड़ा हुआ है आदमी।

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