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मंगलवार, 31 मई 2016

दोहे "विश्व तम्बाकू उन्मूलन दिवस" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

गघे नहीं खाते जिसे, तम्बाकू वो चीज।
खान-पान की मनुज को, बिल्कुल नहीं तमीज।।
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रोग कैंसर का लगे, समझ रहे हैं लोग।
फिर भी करते जा रहे, तम्बाकू उपयोग।।
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खैनी-गुटका-पान का, है हर जगह रिवाज।
गाँजा, भाँग-शराब का, चलन बढ़ गया आज।।
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तम्बाकू को त्याग दो, होगा बदन निरोग।
जीवन में अपनाइए, भोग छोड़कर योग।।
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पूरब वालो छोड़ दो, पश्चिम की सब रीत।
बँधा हुआ सुर-ताल से, पूरब का संगीत।।
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खोलो पृष्ठ अतीत के, आयुध के संधान।
सारी दुनिया को दिया, भारत ने विज्ञान।।
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जगतगुरू यह देश था, देता जग को ज्ञान।
आज नशे की नींद में, सोया चादर तान।।



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