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मंगलवार, 17 मई 2016

गीत "छटा अनोखी अपने नैनीताल की" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

अपना नैनीताल
सारे जग से न्यारी शोभा, इस नैसर्गिक ताल की।
छटा अनोखी मन को भाती, अपने नैनीताल की।।
मई-जून में लू चलती है, जब मैदानी भागों में,
काफल, सेब-खुमानी आते, तब पर्वत के बागों में,
दिन दोपहरी में भी चलती, शीतल हवा कमाल की।
छटा अनोखी मन को भाती, अपने नैनीताल की।।
देश-विदेशों के सैलानी, यहाँ घूमने आते हैं,
मालरोड के मस्त नजारे, सबका मन भरमाते है,
पैदल चलकर सैर करो अब, तल्ली-मल्लीताल की।
छटा अनोखी मन के भाती, अपने नैनीताल की।।
झील किनारे बना हुआ है, नैना देवी का मन्दिर,
माँ के द्वारे पर आते ही, नतमस्तक हो जाता सिर,
घाटी को गुंजित करती ध्वनि, घण्टे औ' घड़ियाल की।
छटा अनोखी मन को भाती, अपने नैनीताल की।।

नौकायन का लुत्फ उठाओ, इस कुदरत की झील में,
 चप्पू स्वयं चलाना सीखो, पानी की तहसील में,
चलती पवनवेग से कितनी, नाव यहाँ पर पाल की।  
छटा अनोखी मन को भाती, अपने नैनीताल की।।

मक्का के भुट्टों का हरदम, दिखता यहाँ झरोखा है, 
अल्मौड़ा की बाल मिठाई, का तो स्वाद अनोखा है,
उँची चोटी से दिखती है, छटा चीन-नेपाल की।
 छटा अनोखी मन को भाती, अपने नैनीताल की।।

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