शनिवार, 28 मई 2016

विविध दोहे "वीरों का बलिदान" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


कितने ही दल हैं यहाँ, एक कुटुम से युक्त।
होते बारम्बार हैं, नेता वही नियुक्त।१।
--
नेता मेरे देश के, ऐसे हैं मरदूद।
भाषण तक सीमित हुए, उनके आज वजूद।२।
--
आज हमारे देश में, सबसे दुखी किसान।
फाँसी खा कर मर रहे, धरती के भगवान।३।
--
अमर शहीदों का जहाँ, होता हो अपमान।
सिर्फ कागजों में बना, अपना देश महान।४।
--
देश भक्ति का हो रहा, पग-पग पर अवसान।
भगत सिंह को आज भी, नहीं मिला है मान।४।
--
गोरों का करते रहे, जो जमकर गुणगान।
शासन का उनको मिला, सत्ता-सूत्र-कमान।६।
--
लोकतान्त्रिक देश में, कहाँ रहा जनतन्त्र।
गलियारों में गूँजते, जाति-धर्म के मन्त्र।७।
--
राम और रहमान को, भुना रहे हैं लोग।
जनता दुष्परिणाम को, आज रही है भोग।८।
--
वर्तमान है लिख रहा, अब अपना इतिहास।
आम रहेंगे आम ही, खास रहेंगे खास।९।
--
याद हमेशा कीजिए, वीरों का बलिदान।
सीमाओं पर देश की, देते जान जवान।१०।
--
उनकी शौर्य कहानियाँ, गाते धरती-व्योम।
आजादी के यजन में, किया जिन्होंने होम।११।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।