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मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

दोहे "प्रेम-प्रीत का ढंग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

दिल से मत तजना कभीप्रीत-रीत उदगार।
सारस से तुम सीख लोक्या होता है प्यार।१।

प्रेम दिवस पर लीजिएव्रत जीवन में धार।
हर पल करना चाहिएसच्चा-सच्चा प्यार।‍‍‍२।

एक दिवस के ही लिएउमड़ रहा प्यार।
प्रणय दिवस के बाद मेंबढ़ जाता तक़रार।३।

पूरे जीवन प्यार काउतरे नहीं खुमार।
जीवनसाथी से सदाकरना ऐसा प्यार।४।

चहक रहे हैं बाग मेंकलियाँ-सुमन अनेक।
धीरज और विवेक सेचुनना केवल एक।५।

सुख सरिता बहती रहेधार न हो अवरुद्ध।
निशि-दिन प्रेम प्रवाह सेइसको करो समृद्ध।६।

मन-विचार मिल जाय जबसमझो तभी बसन्त।
पल-प्रतिपल मधुमास हैसमझो आदि न अन्त।७।

चिकनी-चुपड़ी देखकर,मत टपकाओ लार।
सोच-समझकर ही सदादेना कुछ उपहार।८।

कंकड़-काँटों से भरीनहीं राह अनुकूल।
लेकर प्रीत कुदाल कोसभी हटाना शूल।९।

केसर-क्यारी को सदास्नेह सुधा से सींच।
पुरुष न होता उच्च हैनारि न होती नीच।१०।

पश्चिम की है सभ्यताप्रेमदिवस का वार।
लेकिन अपने देश मेंप्रतिदिन प्रेम अपार।११।

कभी नहीं जो मिट सकेबरसाओ वह रंग।
सिखलाओ संसार कोप्रेम-प्रीत का ढंग।१२।

आडम्बर से है भराप्रेमदिवस का खेल।
चमक-दमक में खो गयासुमनों का ये मेल।१३।

जग को खुशियाँ बाँटनेआता है ऋतुराज।
मस्ती में डूबा हुआसारा सभ्य समाज।१४।

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