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शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

ग़ज़ल "चमन की तलाश में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कितने हसीन फूल, खिले हैं पलाश में
फिर भी भटक रहे हैं, चमन की तलाश में

पश्चिम की गर्म आँधियाँ, पूरब में आ गयी
ग़ाफ़िल हुए हैं लोग, क्षणिक सुख-विलास में

जब मिल गया सुराज तो, किरदार मर गया
शैतान सन्त सा सजा, उजले लिबास में

क़श्ती को डूबने से, बचायेगा कौन अब
शामिल हैं नयी पीढ़ियाँ, अब तो विनाश में

किसको सही कहें अब, और कौन ग़लत है
असली ज़हर भरा हुआ, नकली मिठास में

काग़ज़ के फूल में, कभी आती नहीं सुगन्ध
मसले गये सुमन सभी, भीनी सुवास में

बदला हुआ है “रूप”, रंग और ढंग भी
अन्धे चलें हैं देखने, दुनिया उजास में 

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