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बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

विविध दोहावली "भारत माँ के लाल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

निहित ज्ञान का पुंज हैगीता में श्रीमान।
पढ़ना इसको ध्यान सेइसमें है विज्ञान।।

जनता की है दुर्दशाजन-जीवन बेहाल।
कूड़ा-कर्कट बीनतेभारत माँ के लाल।।

मामा शकुनि हो गयेबिगड़ गये हैं ढंग।
पक्षपात को देखकरहुए भानजे दंग।।

देते हैं सन्ताप कोनीच घरों के लोग।
इसीलिए तो मुकदमेंलोग रहे हैं भोग।।

चना-चबेना भी नहींमहँगाई की मार।
अब तो इस सरकार सेगया आदमी हार।।

आड़ी-तिरछी हाथ मेंहोतीं बहुत लकीर।
कोई है राजा यहाँकोई रंक-फकीर।।

सुख देती है सभी कोजल की नेह फुहार।
वासन्ती परिवेश मेंकुदरत का उपहार।।

पाषाणों की चोट सेशीशा जाता टूट।
मनुज कभी झुकता नहींपीकर गम के घूँट।।

हर युग में होती रहीअभिमन्यू की मौत।
खुली चुनौती दे रहाचन्दा को खद्योत।।

शिकवा और शिकायतेंजीवन के हैं साथ।
बुरे वक्त में दोस्त कोआजमाइए तात।।

हँसकर जीवन को जियोरहना नहीं उदास।
नीरसता को त्याग करकरो हास-परिहास।।

प्रणय जगाता है सदातन-मन में उदगार।
प्रेम हमेशा ही रहाजीवन का आधार।।

नौनिहाल को सीख देंसुधरेगा संसार।
कहने से पहले जरामन में करो विचार।।

चिपकी-चिपकी पेंट सेनंगी देह दिखाय।
अच्छा-खासा आदमीनंगा सा बन जाय।।
नंगापन फैशन बना, इससे रहना दूर।
पूरब वाले क्यों हुए, फैशन में मजबूर।।
बिगड़ गया है आज तो, दुनिया का परिधान।
मानवता का हो रहा, पग-पग पर अपमान।। 

3 टिप्‍पणियां:

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