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शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

कविता ''धान खेत में लहराते" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



कई दिनों से नभ में,
बादल ने डाला है डेरा।
सूरज मना रहा है छुट्टी,
दिन में हुआ अन्धेरा।।
हरियाली बिखरी धरती पर,
दादुर गाते गान मधुर।
शाम ढली तो सन्नाटे को,
चीर रहा झींगुर का सुर।
आसमान का पानी पीकर,
धान खेत में लहराते।
काफल-सेब, खुमानी-आड़ू,
छटा अनोखी दिखलाते।
बाहर पानी-भीतर पानी,
पानी की है ग़जब रवानी।
इठलाती-बलखाती आयी,
नद-नालों में नई जवानी।
बरस रहा चौमास झमाझम,
बारिश में मत जाओ।
आलू, प्याज और बैंगन के,
गरम पकौड़े खाओ।
 
पढ़कर के अख़बार, आओ
काग़ज़ की नाव बनायें।
गड्ढों के ठहरे पानी में,
अपनी नौका तैरायें।

1 टिप्पणी:

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