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रविवार, 6 अगस्त 2017

दोहे "निश्छल पावन प्यार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


परम्परा मत समझना, राखी का त्यौहार।
रक्षाबन्धन में निहित, होता पावन प्यार।।
--
राखी लेकर आ गयी, बहना बाबुल-द्वार।
भाई देते खुशी से, बहनों को उपहार।।
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रक्षाबन्धन पर्व का, दिन है सबसे खास।
जिनके बहनें हैं नहीं, वो हैं आज उदास।।
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ममता की इस डोर में, उमड़ा रहा है प्यार।
भावनाओं से बँधें हैं, सम्बन्धों के तार।।
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अपनी बहनों से कभी, मत होना नाराज।
भइया रक्षा-सूत्र की, रखना हरदम लाज।।
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धागे कच्चे हों भले, ममता है मजबूत।
लेकिन भाई का हृदय , कर देते अभिभूत।।
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जरी-सूत या जूट के, धागे हैं अनमोल।
गौरव के इतिहास से, सज्जित है भूगोल।।
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राखी के दिन देश में, उमड़ा प्यार-अपार।
रिश्ते-नातों की चहक, देख रहा संसार।।
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निश्छल पावन प्यार का, होता जहाँ निवेश।
न्यारा सारे जगत से, मेरा भारत देश।।

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द" में सोमवार 07 अगस्त 2017 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.com आप सादर आमंत्रित हैं ,धन्यवाद! "एकलव्य"

    उत्तर देंहटाएं

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