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रविवार, 13 अगस्त 2017

दोहागीत "कमा रहे हैं माल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


तन के उजले मन के गन्दे।
कितने बदल गये हैं बन्दे।।

शब्दकोश तक रह गयाअब तो जग में प्यार।
अपने सुख के ही लिएकरते सब व्यापार।।
भोग-विलासों में सब अन्धे।
कितने बदल गये हैं बन्दे।।

मतलब में पहचानतेकरते प्यार-अपार।
हित-साधन के बाद मेंदेते हैं दुत्कार।।
निशिदिन फेंक रहे हैं फन्दे।
कितने बदल गये हैं बन्दे।।

ग्राम-नगरपरदेश मेंफैला इनका जाल।
कुटिलचाल चलते हुएकमा रहे है माल।।
दुनिया भर में फैले धन्धे।
कितने बदल गये हैं बन्दे।।

4 टिप्‍पणियां:

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