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मंगलवार, 8 मई 2018

दोहे "मन में तरल-तरंग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

 
जाग गया है नींद से, जिन्ना का अब जिन्न। 
ऐसे लोगों से हुआ, हृदय देश का खिन्न।।  

शैतानी करतूत पर, आती है अब घिन्न। 
रहना निज औकात में, ओ जिन्ना के जिन्न।। 

रक्तबीज सी हो रही, जिन्ना की औलाद। 
इसीलिए उगने लगा, धरती में अवसाद।। 

निभा रहे क्यों प्यार के, उनसे रिति-रिवाज। 
आस्तीन के साँप का, कुचलो फन अधिराज।। 

मिटा दीजिए मूल से, रोज-रोज की राड़। 
फिर से अब कर दीजिए, बैरी को दो-फाड़।। 

जिसके होठों पर रहे, भेद भरी मुस्कान। 
उस पंछी के नोच पर, कर दो मुख को म्लान।। 

पग-पग पर जो कर रहे, हम लोगों को तंग। 
उठती क्यों उनके लिए, मन में तरल-तरंग।।

3 टिप्‍पणियां:

  1. आजादी से पहले सब ने हिंदुस्तान के लिए लड़ाइयां लड़ी
    आजादी के टाइम भी अंग्रेजो ने बड़ी चालाकी से हिंदुस्तान के दो टुकड़े कर दिए...
    अतः सम्भावीक तोर पर हमारे हीरोज़ भी दो भागों में बंट गए
    अगर जिन्ना गलत हैं तो
    गांधी व नेहरू भी उतने ही गलत हैं जितना जिन्ना।

    भगतसिंह सुखदेव और राजगुरु फिर कौनसे देश के हीरोज हैं
    क्योंकि उनकी कर्मस्थली लाहौर थी।
    सोचने की जरूरत हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (09-05-2018) को "जिन्ना का जिन्न" (चर्चा अंक-2965) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

    उत्तर देंहटाएं

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