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रविवार, 20 मई 2018

दोहे "गीदड़ और विडाल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

रास न आयी दलों को, महामहिम की चाल।
करनाटक में कमल का, सूख गया है ताल।।

न्यायालय ने कर दिये, सपने चकनाचूर।
ढाई दिन में हो गये, वो सत्ता से दूर।।

नहीं किसी के पक्ष में, आया जन आदेश।
नूरा कुश्ती का बना, करनाटक प्रादेश।।

कल तक उनको थी नहीं, उनकी तो दरकरार।
मिल कर दोनों आज वो, बना रहे सरकार।।

मछुआरों ने ताल में, फेंक दिया है जाल।
माल देखकर मिल गये, गीदड़ और विडाल।।

नहीँ एक सी नीतियाँ, नहीं एक सा ढंग।
मजबूरी के साथ में, नहीं निभेगा संग।।

आपस में करते रहे, जो कल तक थे जंग।
बदल रहे हैं आज वो, गिरगिट जैसा रंग।।

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (21-05-2017) को "गीदड़ और विडाल" (चर्चा अंक-2977) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

    उत्तर देंहटाएं
  2. जन साधारन देख येह रह जाएँगे दंग |
    सबदल यूँ मेलाएँगे मेलें जूँ सब रंग ||

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही सुन्दर दोहे हैं सभी ...

    उत्तर देंहटाएं

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