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बुधवार, 2 मई 2018

दोहे "मजदूरों के सन्त" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

श्रमिकों से जिनका नहीं, कोई भी सम्बन्ध।
श्रमिक-दिवस पर लिख रहे, वो भी शोध-प्रबन्ध।।
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सुबह दस बजे जागते, सोते आधी रात।
खाते माल हराम का, करते श्रम की बात।।
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काँटे और गुलाब का, कैसा है संयोग।
अन्तर आलू-आम का, नहीं जानते लोग।।
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नहीं गये जो बाग में, देखा नहीं बसन्त।
वही बने हैं आज भी, मजदूरों के सन्त।।
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जिसने झेली ही नहीं, शीत-ग्रीष्म-बरसात।
वो जननायक कर रहा, मजदूरों की बात।।
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सस्ता बिका किसान का, गेहूँ-चावल-दाल।
जाते ही बाजार में, आ जाता भूचाल।।
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महँगी बहुत शराब क्यों, कोई नहीं जवाब।
क्यों होती श्रमवीर की, हालत यहाँ खराब।।
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सत्ता में आये भले, कोई भी सरकार।
नहीं किसानों का करे, कोई भी उपकार।।
  

2 टिप्‍पणियां:

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