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शनिवार, 5 मई 2018

दोहे "डोल रहा ईमान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

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यादों में आने लगे, अगर अनोखी गन्ध।
तब समझो अजनबी से, हुआ नया अनुबन्ध।।

चाहे कविताएँ लिखो, चाहे लिखो निबन्ध।
लेकिन तन-मन का रखो, आपस में सम्बन्ध।।

छोटा हो या हो बड़ा, या साझा परिवार।
ताल-मेल के साथ में, चलता है संसार।।

दनुज-मनुज के भेद का, गलत हुआ अनुमान।
पग-पग पर इंसान का, डोल रहा ईमान।।

झूठ हमेशा हारता, सच की होती जीत।
अधिक देर टिकता नहीं, मतलब वाला मीत।।

मत-मजहब का आज तो, सबको चढ़ा बुखार।
पण्डित-मुल्ला-पादरी, करते बण्टाधार।।

पनप रहे हैं देश में, अब तो ठेकेदार।
नौका अब मझधार से, कौन करेगा पार।।

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (07-05-2017) को "मिला नहीं है ठौर ठिकाना" (चर्चा अंक-2963) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

    उत्तर देंहटाएं
  2. बुजर्गों वाली सिख से भरपूर पोस्ट

    उत्तर देंहटाएं

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