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रविवार, 27 मई 2018

दोहे "मोह सभी का भंग" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

अपने-अपने पेंच हैं, अपने-अपने दाँव।
दल-दल में सबके यहाँ, धँसे हुए हैं पाँव।।

बिना बुलाये आ रहे, वोट माँगने लोग।
दुखती रग को पकड़कर, बढ़ा रहे हैं रोग।।

चार साल से पूर्व जो, दिखते थे सम्पन्न।
महँगाई कर दिया, उनको आज विपन्न।।

गंगू भाई बन गया, जब से राजा भोज।
सुरसा के मुख सी बढ़े, महँगाई हर रोज।।

तानाशाही का हुआ, जबसे उनका ढंग।
धीरे-धीरे हो रहा, मोह सभी का भंग।।

पढ़े-लिखो को दे रहा, राजा आज सुझाव।
तलो पकौड़े रोड पर, बेचो भाजी-पाव।।
--
निर्धन श्रमिक किसान का, जो रखता था ध्यान।
कुनबेदारी से हुआ, उस दल का अवसान।।

दल तो उमरदराज है, नेता अनुभवहीन।
इसीलिए हर क्षेत्र में, होती है तौहीन।।
  

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (28-05-2018) को "मोह सभी का भंग" (चर्चा अंक-2984) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह ... बहुत चुटीले दोहे ...
    घाव करें गंभीर ...

    उत्तर देंहटाएं

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