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गुरुवार, 13 जून 2019

दोहे "जंगल का कानून" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


मन में तो है मलिनता, होठों पर हरिनाम।
मतलब में आता सदा, याद राम का नाम।।

काम पड़ा तो आ गये, लोग हमारे धाम।
महज दिखावे के लिए, करते दुआ-सलाम।।

बलशाली के सामने, है कमजोर विधान।
भोली जनता पर करें, शासन चतुर-सुजान।।

होते जंगलराज में, शासक अफलातून।
जंगल में चलता सदा, जंगल का कानून।।

नाते-रिश्ते हैं कहाँ, जग में आज पुनीत।
गेहूँ के घुन के सदृश, मिले हमेशा मीत।।

3 टिप्‍पणियां:

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