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शनिवार, 13 जुलाई 2019

ग़ज़ल "ज़ालिमों से पुकार मत करना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

ज़िन्दग़ी तार-तार मत करना
कोई वादा-क़रार मत करना

भावनाओं के जोश में आकर
राहगीरों से प्यार मत करना

ज़लज़ले नाख़ुदा नहीं होते
ज़ालिमों से पुकार मत करना

अपने दिल की सफेद चादर को
बेवज़ह दाग़दार मत करना

अपना दामन बचाना फूलों से
रूपका एतबार मत करना 

4 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (14 -07-2019) को "ज़ालिमों से पुकार मत करना" (चर्चा अंक- 3396) पर भी होगी।

    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ....
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत सुंदर भाव प्रधान सृजन ।

    जवाब देंहटाएं

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