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मंगलवार, 30 जुलाई 2019

ग़ज़ल "चलो भीगें फुहारों में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बरसने लग गया सावन, चलो भीगें फुहारों में
फलक ने रंग बदला है, घटाओं के नजारों में

दरकते हों भले पत्थर, पहाड़ों की शिलाओं के
सुनाते लोरियाँ झरने, महकते देवदारों में

बड़े मायूस हैं मजदूर, अपने आशियानों में
ग्रहण जैसा लगा बारिश से, सारे रोजगारों में

गरीबी झेलती आफत, अमीरी ऐश करती है
मजा भी है सजा भी है, फिजाओं की बहारों में

फलक पर देखकर बादल, किसानों के खिले चेहरे
लगाने धान के पौधे, चले घर से कतारों में

घटाओं में भरा पानी, बरसता झूमकर सावन
खुशी से पेड़ लहराते, भरी मस्ती बयारों में

धनुष के सात रंगों का, सलोना रूपउभरा है
इरादों को बताता है, हमें मौसम इशारों में

2 टिप्‍पणियां:

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