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बुधवार, 17 जुलाई 2019

दोहे "सद्गुरुओं को रंज" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मतलब के हैं अब गुरू, मतलब के हैं शिष्य।
नेह बिना तब पौध का, कैसे बने भविष्य।।
--
लेखन-शोधन के लिए, चलकर आते द्वार।
चेले मतलब के लिए, करते हैं मनुहार।।
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नहीं छिपाये से छिपें, खिलते फूल कनेर।
मिलकर चेले राह में, लेते नजरें फेर।।
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हो जाये गुरु-शिष्य का, रिश्ता यदि निष्काम।
तभी सार्थक हो यहाँ, करना दुआ-सलाम।।
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यदि दैनिक व्यवहार में, बरतें शिष्टाचार।
होगा तब गुरुपूर्णिमा, दिवस यहाँ साकार।।
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बिकती है बाजार में, शिक्षा देकर मोल।
इसीलिए तो योग्यता, होती डाँवाडोल।।
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चाहे समझो सीख ये, चाहे समझो तंज।
होता है यह देखकर, सद्गुरुओं को रंज।।

3 टिप्‍पणियां:

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