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गुरुवार, 18 जुलाई 2019

दोहे "गोरी का शृंगार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


अधरों को अच्छा लगे, अधरों का इकरार।
मन को बहुत लुभा रहा, गोरी का शृंगार।।
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लाल रंग के अधर हैं, घुँघराले से बाल।
दाड़िम जैसे दहकते, उसके गोरे गाल।।
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कजरारे दो नैन हैं, चितवन करें कमाल।
कानों में झुमकी सजें, बिँदिया चमके भाल।।
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रत्न-जटित है करघनी, मोती की है माल।
मटक-मटक कर चल रही, हिरणी जैसी चाल।।
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सजनी साजन के लिए, सजा रही है थाल।
खाने में अच्छी लगे, सब्जी-रोटी-दाल।।
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चटनी-रोटी भी कभी, कर देती सन्तुष्ट।
जीवनभर होना नहीं, घरवाली से रुष्ट।।
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बात-बात पर मत करो, कभी रंग में भंग।
जीवन को जीते रहो, अमन-चैन के संग।
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4 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (20 -07-2019) को "गोरी का शृंगार" (चर्चा अंक- 3402) पर भी होगी।

    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है

    ….
    अनीता सैनी

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह सुंदर सरस शृंगार रचना नख शिखर वर्णन।

    उत्तर देंहटाएं

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