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अपने कुटिया-नीड़ को, रखते सभी सँभाल।
मगर टिकाऊ है नहीं, कपड़े का पंडाल।। -- कट्टरपन्थी मत बनो, रहना सदा उदार।
अन्धभक्ति से पूर्व ही, करना सोच-विचार।।
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मन में श्रद्धा हो भरी, कहते हैं विद्वान।
लेकिन है सबसे बड़ा, दुनिया में भगवान।।
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मतलब के संसार में, लो दिमाग से काम।
मन के भावों का कभी, बनना नहीं गुलाम।।
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पग-पग पर मिलते यहाँ, भाँति-भाँति के लोग।
ओछे लोगों का कभी, करना मत सहयोग।।
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तन से हों बौने भले, मन को रखो विशाल।
नदियों से बढ़ते चलो, मत बन जाना ताल।।
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बहता जल पावन रहे, सड़ता ठहरा ताल।
इसीलिए तालाब में, उग आते शैवाल।।
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जी नमस्ते,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (11-08-2019) को " मुझको ही ढूँढा करोगे " (चर्चा अंक- 3424) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
आप भी सादर आमंत्रित है
….
अनीता सैनी
पग-पग पर मिलते यहाँ, भाँति-भाँति के लोग।
जवाब देंहटाएंओछे लोगों का कभी, करना मत सहयोग।।
एकदम सही बात, रहीम जी ने खूब कहाँ है -
रहिमन ओछे नरन को बैर भली न प्रीत
काटे-चाटे स्वान के दोउ भांति विपरीत
बहुत सुन्दर दोहे
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