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रविवार, 1 अप्रैल 2012

"आज फस्ट अप्रैल है ना!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों!
बहुत पहले सन् 2009 में एक बहिन ने मेरे एक संस्मरण ‘‘चालबाजी की भी सीमाएँ होती है।’’ पर यह टिप्पणी की थी
‘‘संस्मरण प्रेरणादायकों के हों तो रुचते हैं। बीती ताही बिसार दे।’’ उनकी बात का मैंने पूरा ध्यान रखा। परन्तु मूर्ख दिवस पर तो इस चालबाज का संस्मरण प्रकाशित किया ही जा सकता है।)
बात सन् 1987-88 की है। वैद्य जी मेरे कवि मित्रों में थे। लेकिन महाठग किस्म के व्यक्ति थे। मेरी मझली बहन ने उन दिनों बी0एड0 पास किया था। उसे नौकरी की प्रतीक्षा थी। श्रीमान वैद्य जी का उन दिनों मेरे परिवार में काफी आना-जाना था। मेरी अनुपस्थिति में वो मेरी माता जी से काफी बतियाते थे।
माता जी ने वैद्य जी से कहा- ‘‘बेटा तुम बड़े नेता हो। मेरी बिटिया ने बी0एड0 पास किया है। कहीं इसकी नौकरी लगवा दो।’’
वैद्य जी तो चाहते ही यही थे कि कोई चिड़िया फँसे और कुछ माल-पानी का जुगाड़ हो जाये।
झट से बोले- ‘‘माता जी! मेरी पं0 नारायणदत्त तिवारी पर सीधी पकड़ है। मैं बहन की नौकरी लगवा दूँगा। परन्तु इसमें पाँच हजार का खर्चा आयेगा। आप अपने पुत्र से बिल्कुल इस बात का चर्चा न करें। नही तो बात नही बन पायेगी।’’
माता जी ने पुत्री के भविष्य को देखते हुए, मुझे कुछ भी नही बताया। शाम को मेरी श्रीमती जी ने सब बता दिया।
मैंने माता जी से इस विषय में बात की तो-
माता जी ने कहा- ‘‘भैया! वैद्य अच्छा आदमी है। उसको पाँच हजार रुपये देने में कोई हर्ज नही है। बेबी की नौकरी तो लग ही जायेगी।’’
इत्तफाक से तभी वैद्य जी भी आ गये। अब मैंने वैद्य जी की क्लास लेनी शुरू कर दी। परन्तु वैद्य जी के पास तो हर सवाल का जवाब तैयार रहता ही था।
तपाक से बोले- ‘‘शास्त्री जी! आज फस्ट अप्रैल है ना। माता जी को एप्रिल फूल बनाना था सो बना दिया।’’
अब एक अनुवाद भी देख लीजिए!

“प्यार और मित्रता:Emily Bronte”

Love and Friendship poem :

Emily Bronte
अनुवादक:डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”
प्यार
एक जंगली गुलाब है
लेकिन
मित्रता
एक सदाबहार पेड़ है
-- --
जंगलों के झुरमुट में
गुलाबी आभा लिए
जंगली गुलाब
खिलता है लगातार
तब ऐसा प्रतीत होता है
मानों मधुर मधुमास
हँस रहा हो
लेकिन
ग्रीष्म आते ही
यह मुरझा जाता है
इसकी गन्ध
विलीन हो जाती है
और इसे इन्तजार रहता है
सर्दियों के आने का
यह मूर्ख सुमन
दिसम्बर आते ही
अपना शृंगार सँवारेगा
और नये प्रेमियों को
फिर से पुकारेगा
-- --
किन्तु
मित्रता के
पवित्र पेड़ की
हरी-हरी पत्तियाँ
हमेशा स्थिर रहती हैं!

Emily Brontë

AKA Emily Jane Brontë
Born: 30-Jul-1818
Birthplace: Thornton, Yorkshire, England
Died: 19-Dec-1848

13 टिप्‍पणियां:

  1. bade sayane jab murkh banate hue pakada diye jate hain to ye kahkar bach lete hain ki april fool bana diya.

    उत्तर देंहटाएं
  2. कुंडली


    नहीं बैद्यकी चल सकी, बना स्वयं ही फूल ।

    खिसियानी बिल्ली सरिस , झोंक रहा था धूल ।
    झोंक रहा था धूल, बनाता बुद्धू किसको ।
    था माता का स्नेह, डुबाता स्वारथ उसको ।
    मानव सात अरब, मगर लक्षण का अंतर ।
    मात्र चार ही वर्ग, मिलें हर जगह निरंतर ।

    १)

    अत्याधिक हुशियार हैं, दुनिया मूर्ख दिखाय।

    जोड़-तोड़ से हर जगह, लेते जगह बनाय ।।

    २)

    सचमुच में हुशियार हैं, हित पहलें ले साध ।

    कर्म वचन में धार है , बढ़ते रहें अबाध ।।

    ३)

    इक बन्दा सामान्य है, साधे जीवन मूल ।

    कुल समाज भू देश हित, साधे सरल उसूल ।

    ४)

    इस श्रेणी रविकर पड़ा, महामूर्ख अनजान ।

    दुनियादारी से विलग, माने चतुर सयान ।।

    उत्तर देंहटाएं
  3. ये कहने के अलावा और बचा ही क्या था

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह...वाह...वैद्य जी बुद्धिमान निकले!...मूर्ख दिवस के मौके का अच्छा फायदा उठाया!...प्यार और मित्रता की कविता सुन्दर है...बधाई!

    उत्तर देंहटाएं
  5. रोचक अख्यांश, न जाने कब तक ऐसे लोगों का बेडा पर होता रहेगा ...../

    उत्तर देंहटाएं
  6. जाने लोग ऐसे क्यों होते है... आपने अच्छा किया संमरण को शेयर कर मूर्खता दिवस पर सावधान रहने के लिए ताकीद किया ...

    उत्तर देंहटाएं
  7. कुछ लोग साल भर यही करते रहते हैं...जिस दिन कोई फँस गया वही दिन फर्स्ट अप्रैल...

    उत्तर देंहटाएं
  8. चल न पाई वैद्यकी, ऐसी खाई मात.
    दोपहरी में छा गयी, मानो मुख पे रात.:))
    ****
    सुन्दर अनुवादित रचना सर....
    सादर.

    उत्तर देंहटाएं
  9. प्यार और मित्रता के अन्तर का सरल वर्णन।

    उत्तर देंहटाएं

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