वासन्ती मौसम हुआ, काम रहा है जाग।
बगिया में गाने लगे, कोयल-कागा राग।२।
लोगों ने अब प्यार को, समझ लिया आसान।
अपने ढंग से कर रहे, प्रेमी अनुसंधान।३।
खेल हुआ अब प्यार का, आडम्बर से युक्त।
सीमाओं को लाँघता, यौवन है उन्मुक्त।४।
बुरे-भले का है नहीं, कहीं किसी को ज्ञान।
बिना लक्ष्य के उड़ रहा, नभ में प्रीत विमान।५।
प्रेम दिवस पर बह रही, दुनियाभर में धार।
नजर न आया है कहीं, सच्चा-सच्चा प्यार।६।
धीरज और विवेक तो, नहीं किसी के पास।
लोग बुझाना चाहते, बिन पानी के प्यास।७।
कंकड़-काँटों से भरी, प्यार-प्रीत की राह।
मंजिल पाने की सभी, रखते मन में चाह।८।
दिखा नहीं है प्रणय में, मन-विचार का मेल।
समझ लिया संसार ने, इसको केवल खेल।९।
सुख सरिता की धार का, पथ है अब अवरुद्ध।
अविरल प्रेम प्रवाह से, इसको करो समृद्ध।१०।
दिल से मत तजना कभी, प्रीत-रीत उद्गार।
सारस से लो सीख तुम, क्या होता है प्यार।११।
चिकनी-चुपड़ी देखकर, मत टपकाओ लार।
प्यार नहीं है वासना, यह तो है उपहार।१२।
अपनाओ वो सभ्यता, जिसमें हो अनुराग।
पश्चिम अनुकरण का, अब तो कर दो त्याग।१३।
चुनिये सोच-विचारकर, जीवन भर के मीत।
जिसको सुर में गा सको, वही बनाओ गीत।१४।
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आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (14-02-2020) को "प्रेम दिवस की बधाई हो" (चर्चा अंक-3611) पर भी होगी।
जवाब देंहटाएं--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
आँचल पाण्डेय
अपनाओ वो सभ्यता, जिसमें हो अनुराग।
जवाब देंहटाएंपश्चिम अनुकरण का, अब तो कर दो त्याग।
बहुत ही सुंदर बात कही आपने सर ,प्रेम दिवस तो मातृपितृ पूजन दिवस ही होना चाहिए ,सादर नमन आपको
सुंदर सार्थक दोहे ।
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