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मंगलवार, 15 सितंबर 2020

दोहे "हिन्दी है कमजोर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


भाषा के आकाश पर, बादल हैं घनघोर।
अँगरेजी भी है लचर, हिन्दी भी कमजोर।।
 --
अँगरेजी का हो रहा, भारत में परित्राण।
नौकरशाहों के चले. निज भाषा पर बाण।।
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शब्दों का अम्बार है, लेकिन है उलझाव।
आते मस्तक में नहीं, अब तो नूतन भाव।।
-- 
लिखता कविता-दोहरे, रचता रहता गीत।
चौथेपन में कर रहा, अपना समय व्यतीत।।
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लोगों ने अब कर दिये, नंगे सभी पहाड़।
देवभूमि के चमन में, दिखने लगा उजाड़।।
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पर्वत का वातावरण, अब तो हुआ खराब।
 लोग धड़ल्ले से यहाँ, पीने लगे शराब।।
 --
अब भाषा के नाम पर, होने लगा मखौल।
शोर-शराबे से हुआ, दूषित अब माहौल।। 
 --

3 टिप्‍पणियां:

  1. अब भाषा के नाम पर, होने लगा मखौल।
    शोर-शराबे से हुआ, दूषित अब माहौल।।
    ,..सच का आईना

    जवाब देंहटाएं
  2. आ डॉ रूप चंद शास्त्री "मयंक" सर जी, बहुत ही सटीक दोहे। साधुवाद!--ब्रजेन्द्रनाथ

    जवाब देंहटाएं

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