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रविवार, 27 सितंबर 2020

दोहागीत "बेटी दिवस" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 

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बेटी से आबाद हैंसबके घर-परिवार।
बेटो जैसे दीजिएबेटी को अधिकार।
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दुनिया में दम तोड़तामानवता का वेद।
बेटा-बेटी में बहुतजननी करती भेद।।
बेटा-बेटी के लिएहों समता के भाव।
मिल-जुलकर मझधार सेपार लगाओ नाव।।
माता-पुत्री-बहन काकभी न मिलता प्यार।
बेटो जैसे दीजिएबेटी को अधिकार।
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पुरुषप्रधान समाज मेंनारी का अपकर्ष।
अबला नारी का भलाकैसे हो उत्कर्ष।।
कृष्णपक्ष की अष्टमीऔर कार्तिक मास।
जिसमें पुत्रों के लिएहोते हैं उपवास।।
ऐसे रीति-रिवाज कोबार-बार धिक्कार।
बेटो जैसे दीजिएबेटी को अधिकार।
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जिस घर में बेटी रहेसमझो वे हरिधाम।
दोनों कुल का बेटियाँकरतीं ऊँचा नाम।।
कुलदीपक की खान कोदेते क्यों हो दंश।
बिना बेटियों के नहीं, चल पायेगा वंश।।
अगर न होती बेटियाँथम जाता संसार।
बेटो जैसे दीजिएबेटी को अधिकार।
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लुटे नहीं अब देश मेंमाँ-बहनों की लाज।
बेटी को शिक्षित करोउन्नत करो समाज।।
एक पर्व ऐसा रचोजो हो पुत्री पर्व।
व्रत-पूजन के साथ मेंकरो स्वयं पर गर्व।।
सेवा करने में कभीसुता न माने हार।
बेटो जैसे दीजिएबेटी को अधिकार।
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माता बनकर बेटियाँदेतीं जग को ज्ञान।
शिक्षित माता हों अगरशिक्षित हों सन्तान।।
संविधान में कीजिएअब ऐसे बदलाव।
माँ-बहनों के साथ मैंबुरा न हो बर्ताव।।
क्यों बेटो की चाह मेंरहे बेटियाँ मार।
बेटो जैसे दीजिएबेटी को अधिकार।
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6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर संदेश देती रचना।

    जवाब देंहटाएं
  2. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा सोमवार 28 सितंबर 2020) को "बेटी दिवस" (चर्चा अंक-3838) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्त्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाए।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    --
    -रवीन्द्र सिंह यादव

    जवाब देंहटाएं
  3. सुन्दर सार्थक हृदयस्पर्शी सृजन .

    जवाब देंहटाएं
  4. माता बनकर बेटियाँ, देतीं जग को ज्ञान।
    शिक्षित माता हों अगर, शिक्षित हों सन्तान।।
    संविधान में कीजिए, अब ऐसे बदलाव।
    माँ-बहनों के साथ मैं, बुरा न हो बर्ताव।।
    क्यों बेटो की चाह में, रहे बेटियाँ मार।
    बेटो जैसे दीजिए, बेटी को अधिकार।।
    बहुत ही सुंदर भाव के साथ एक सुंदर संदेश आदरणीय शास्त्री जी आपकी हर रचना में एक शानदार मैसेज छुपा होता है

    जवाब देंहटाएं
  5. जिस घर में बेटी रहे, समझो वे हरिधाम।
    दोनों कुल का बेटियाँ, करतीं ऊँचा नाम।।
    कुलदीपक की खान को, देते क्यों हो दंश।
    बिना बेटियों के नहीं, चल पायेगा वंश।
    बिल्कुल सटीक....
    बहुत ही सुन्दर सार्थक सृजन
    वाह!!!

    जवाब देंहटाएं

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