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बुधवार, 16 सितंबर 2020

पाँच मुक्तक "चाँदनी रात बहुत दूर गई" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

।१।
जानते हैं सच तभी तो मौन हैं वो,
और ज्यादा क्या कहें हम कौन हैं वो।
जो हमारे दिल में रहते थे हमेशा-
हरकतों से हो गए अब गौण हैं वो।।
।२।
दिल तो सूखा कुआँ नहीं होता,
बिन लिखे मजमुआँ नहीं होता।
लोग पल-पल की ख़बर रखते हैं-
आग के बिन धुँआ नहीं होता।।
।३।
उनकी सौगात बहुत दूर गई,
लगता है बात बहुत दूर गई।
रौशनी होगी नहीं तारों से-
चाँदनी रात बहुत दूर गई।।
।४।
कोई आया था हौसले भरने,
कोई आया था चोंचले करने।
कोई आया था खास मक़सद से-
कोई आया था फासले करने।।
।५।
इतनी मजबूत राह थी पाई,
एक बरसात में बनी खाई।
दोष क्यों दे रहे हो लहरों को-
जब किनारे हुए हैं हरजाई।।
--

5 टिप्‍पणियां:

  1. दोष क्यों दे रहे हो लहरों को-
    जब किनारे हुए हैं हरजाई।। बहुत सतिक अभिव्यक्ति।

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 17.9.2020 को चर्चा मंच पर दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी|
    धन्यवाद
    दिलबागसिंह विर्क

    जवाब देंहटाएं
  3. कोई आया था हौसले भरने,
    कोई आया था चोंचले करने।
    कोई आया था खास मक़सद से-
    कोई आया था फासले करने।

    वाह, बहुत ख़ूब

    जवाब देंहटाएं

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