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शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

गीत "खेतों में झुकी हैं डालियाँ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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धान्य से भरपूर,

खेतों में झुकी हैं डालियाँ।

धान के बिरुओं ने,

पहनी हैं नवेली बालियाँ।।

--

क्वार का आया महीना,

हो गया निर्मल गगन,

ताप सूरज का घटा,

बहने लगी शीतल पवन,

देवपूजन के लिए,

सजने लगी हैं  थालियाँ।

धान के बिरुओं ने,

पहनी हैं नवेली बालियाँ।।

-- 

थम गई बरसात,

अब मौसम सुहाना आ गया,

षटपदों को रूप,

उपवन का सलोना भा गया,

हो गयी हैं अब नगर की

साफ-सुथरी नालियाँ।

धान के बिरुओं ने,

पहनी हैं नवेली बालियाँ।।

--

सुमन-कलियों की चमन में,

डोलियाँ सजने लगीं,

भ्रमर गुंजन कर रहे,

शहनाइयाँ बजने लगीं,

प्रणय-मण्डप में मधुर,

बजने लगीं हैं तालियाँ।

धान के बिरुओं ने,

पहनी हैं नवेली बालियाँ।।

--

7 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (१९-०९-२०२०) को 'अच्छा आदम' (चर्चा अंक-३८२९) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    --
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  2. प्रकृति के मनोरम रूप का बहुत सुन्दर वर्णन ।

    जवाब देंहटाएं
  3. सहज सुन्दर प्रकृति का चित्रण

    जवाब देंहटाएं
  4. डाक्टरों के भी फुर्सत का समय आ गया

    जवाब देंहटाएं
  5. धान के बिरुओं ने,
    पहनी हैं नवेली बालियाँ...

    अत्यंत सुंदर हृदयग्राही पंक्तियां
    हार्दिक साधुवाद 🙏

    जवाब देंहटाएं
  6. वाह!!!
    सुन्दर सरस मनभावन सृजन।

    जवाब देंहटाएं

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