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सोमवार, 21 सितंबर 2020

बालकविता "काँधे पर हल धरे किसान" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

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सूरज चमका नील-गगन में।
फैला उजियारा आँगन में।।

काँधे पर हल धरे किसान। 
करता खेतों को प्रस्थान।।

मेहनत से अनाज उपजाता।
यह जग का है जीवन दाता।।

खून-पसीना बहा रहा है।
स्वेद-कणों से नहा रहा है।।

जीवन भर करता है काम।
लेता नही कभी विश्राम।।

चाहे सूर्य अगन बरसाये।
चाहे घटा गगन में छाये।।

कृषक सदा श्रम में संलग्न।
अपनी धुन में रहता मग्न।।

मत कहना इसको इंसान।
यह धरती का है भगवान।।

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3 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (22-9 -2020 ) को "काँधे पर हल धरे किसान"(चर्चा अंक-3832) पर भी होगी,आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    ---
    कामिनी सिन्हा

    जवाब देंहटाएं

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