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सोमवार, 28 सितंबर 2020

दोहे "कठिनाई में पड़ गया, चिट्ठों का संसार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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मुखपोथी ने दे दिया, जब से नूतन रूप।

बादल के आगोश में, छिपी सुहानी धूप।।

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ब्लॉगर ने भी कर दिया, ऐसा वज्र प्रहार।

कठिनाई में पड़ गया, चिट्ठों का संसार।।

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नहीं सुहाता है हमें, ये बदलाव अनूप।

सामाजिक परिवेश का, दुखदायी ये रूप।।

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नये-नये बदलाव से, खिसक रहा आधार।

दुविधा में ब्लॉगर पड़े, कैसे पायें पार।।

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नवयुग का अब अंग है, जग में अन्तर्जाल।

पहले ही प्रारूप को, फिर से करो बहाल।।

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परिवर्तन जग का नियम, जीवन का पर्याय।

जिसमे हो कुछ सरलता, ऐसे करो उपाय।।

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जालजगत है देवता, मुखपोथी भगवान।

चिट्ठाकारी के लिए, गूगल है वरदान।।

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5 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (29-9 -2020 ) को "सीख" (चर्चा अंक-3839) पर भी होगी,आप भी सादर आमंत्रित हैं।
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    कामिनी सिन्हा

    जवाब देंहटाएं
  2. ब्लॉग प्रारूप परिवर्तन की कठिनाइयों पर बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।

    जवाब देंहटाएं
  3. सुंदर यथार्थपरक दोहे

    जवाब देंहटाएं
  4. ब्लॉग प्रारूप परिवर्तन की कठिनाइयों से तो जैसे तैसे निपट ही लेंगे परंतु फेसबुक पर ब्लॉगर्स का समय अब अधिक व्यतीत हो रहा है। फेसबुक से मिलनेवाली त्वरित प्रसिद्धी, लोकप्रियता के आकर्षण में हम फँस रहे हैं। वैसे फेसबुक fake book ही है। सादर प्रणाम।

    जवाब देंहटाएं

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