थाम
हाथ में चल पड़े, छल-बल की पतवार।।
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बातें
बहुत लुभावनी, नहीं इरादे नेक।
मछुआरे
तालाब में, जाल रहे हैं फेंक।।
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निशाचरों के देश में, है लाचार समाज। उल्लू का बच्चा करे, जंगल में अब राज।। --
सब
अपने को कर रहे, सच्चा सेवक सिद्ध।
देश
नोचने के लिए, फिर मंडराये
गिद्ध।।
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सबको
अपनी ही पड़ी, जाये भाड़ में देश।
जनता
को भड़का रहे, भर साधू का भेष।।
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मत
देना उनको नहीं, जिनके मन में खोट।
देना
अपना साथियों, सोच-समझकर वोट।।
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आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 20-03-2014 को चर्चा मंच पर दिया गया है
जवाब देंहटाएंआभार
वाह :)
जवाब देंहटाएंसुन्दर पंक्तियाँ, जन जन को अपने वोट का मूल्य तो समझना ही पड़ेगा।
जवाब देंहटाएं
जवाब देंहटाएंवाह भाई वाह !
निर्वाचन की नाव में, नेता हुए सवार।
थाम हाथ में चल पड़े, छल-बल की पतवार।।
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बातें बहुत लुभावनी, नहीं इरादे नेक।
मछुआरे तालाब में, जाल रहे हैं फेंक।।
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निशाचरों के देश में, है लाचार समाज।
उल्लू का बच्चा करे, जंगल में अब राज।।
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सब अपने को कर रहे, सच्चा सेवक सिद्ध।
देश नोचने के लिए, फिर मंडराये गिद्ध।।
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सबको अपनी ही पड़ी, जाये भाड़ में देश।
जनता को भड़का रहे, भर साधू का भेष।।
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मत देना उनको नहीं, जिनके मन में खोट।
देना अपना साथियों, सोच-समझकर वोट।।
सबके अपने भ्रष्ट है नेता सबके एक ,
दूसरी पंक्ति शास्त्री जी लिखेंगे
विस्तृत ब्योरे के लिए केजरी जी वाल से संपर्क करें। बेहतरीन चुनावी दोहे
इस बार नोटा का ऑप्शन भी है...
जवाब देंहटाएंसुन्दर रचना..
जवाब देंहटाएं...
बहुत बढ़िया..
जवाब देंहटाएं