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बुधवार, 19 मार्च 2014

"दोहे-निर्वाचन की नाव" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


निर्वाचन की नाव में, नेता हुए सवार।
थाम हाथ में चल पड़े, छल-बल की पतवार।।
--
बातें बहुत लुभावनी, नहीं इरादे नेक।
मछुआरे तालाब में, जाल रहे हैं फेंक।।
--
निशाचरों के देश में, है लाचार समाज।
उल्लू का बच्चा करे, जंगल में अब राज।।
--
सब अपने को कर रहे, सच्चा सेवक सिद्ध।
देश नोचने के लिए, फिर मंडराये गिद्ध।।
--
सबको अपनी ही पड़ी, जाये भाड़ में देश।
जनता को भड़का रहे, भर साधू का भेष।।
--
मत देना उनको नहीं, जिनके मन में खोट।
देना अपना साथियों, सोच-समझकर वोट।।

7 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 20-03-2014 को चर्चा मंच पर दिया गया है
    आभार

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुन्दर पंक्तियाँ, जन जन को अपने वोट का मूल्य तो समझना ही पड़ेगा।

    उत्तर देंहटाएं

  3. वाह भाई वाह !

    निर्वाचन की नाव में, नेता हुए सवार।
    थाम हाथ में चल पड़े, छल-बल की पतवार।।
    --
    बातें बहुत लुभावनी, नहीं इरादे नेक।
    मछुआरे तालाब में, जाल रहे हैं फेंक।।
    --
    निशाचरों के देश में, है लाचार समाज।
    उल्लू का बच्चा करे, जंगल में अब राज।।
    --
    सब अपने को कर रहे, सच्चा सेवक सिद्ध।
    देश नोचने के लिए, फिर मंडराये गिद्ध।।
    --
    सबको अपनी ही पड़ी, जाये भाड़ में देश।
    जनता को भड़का रहे, भर साधू का भेष।।
    --
    मत देना उनको नहीं, जिनके मन में खोट।
    देना अपना साथियों, सोच-समझकर वोट।।

    सबके अपने भ्रष्ट है नेता सबके एक ,

    दूसरी पंक्ति शास्त्री जी लिखेंगे
    विस्तृत ब्योरे के लिए केजरी जी वाल से संपर्क करें। बेहतरीन चुनावी दोहे

    उत्तर देंहटाएं
  4. इस बार नोटा का ऑप्शन भी है...

    उत्तर देंहटाएं

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